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बेटवा कै लड्डू

बलराम सिंह इ बात होए क़रीब सन १९९२ कै, जब हमय मासाचूसेट्ट्स यूनिवर्सिटी मॉ पढ़ावत क़रीब दुई साल भा रहा होए। वैसे तौ अमेरिका मॉ रहत हमका लगभग नौ साल होईगा रहा, लकिन विद्यार्थी जीवन कै बात कुछ और होथै, सब पढ़ाई लिखाई के काम मॉ लगा रहाथे,  एतना फ़ुरसत नाहीं मिलत कि कौनव सामाजिक…
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मैंने गाँव देखा है…

श्रीमति प्रीति कौशिक मैंने गाँव देखा है.. जहाँ शहरों में हम ज़रूरत में खुद को अकेला पाते हैं, वहाँ गाँव में मैंने बड़ों से अपने, सर पे हाथ फेरते देखा है। मैंने गाँव देखा है..  जहाँ शहरों में ज़िन्दगी भागती जाती है, वहाँ गाँव में मैंने बुढ़ापा भागते देखा है। मैंने गाँव देखा है.. जहाँ…
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ग्रामीण-समाज की व्यवस्था में रिश्तों की गहराई की झलक

डा. अपर्णा धीर खण्डेलवाल शहरवासियों की दृष्टि में गाँव एवम् ग्रामीणवासी सदैव ही सादा जीवन, सरल बोली, साधारण वेशभूषा, तथा सात्त्विक भोजन की छाप छोडे़ हुए है। मन में ऎसी ही छवि बिठाऐ हुए संयोगवश आज से लगभग चार वर्ष पहले मुझे भी एक गाँव में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। मैं चर्चा कर रही…
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कैसे गाँव ही विकास की इकाई तथा सभ्यता है?

बलराम सिंह अभी जब महामारी का समय आया, तब लोग गांव की तरफ भागने लगे, बहुत सारे लोग गांव की तरफ चले गए, क्योंकि लोगों को गांव एक सुरक्षित जगह लगती है, ऐसा मुझे लगता है। मैं भी एक गांव का रहने वाला हूँ, जोकि अयोध्या के पास है। हमारे गाँव का नाम बड़ा अजीब-सा…
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